बस्ती है

किनारों कि बस्ती है
कीमत जरा सस्ती है
ओरों की रह गैर
कभी किसी को नही समझती है
खूब कोई आए जाए, ये समुंदर की बस्ती है

जिसको ठहरना है ठहरो यहां
इसकी जैसी बहारें लहरे कहां
सबको अपने जैसा ही तो समझती
ये कोई और नहीं समुंदर की बस्ती है

मन हो तुम सांझ देखो
सूरज समुंदर की हर आंच देखो
चाहे सुबह पांच देखो या सांझ पांच देखो
भिड़ की दुनिया में चंचलता समझती है
यही तो समुंदर की बस्ती है।

देखो कितनों का ठिकाना है
नए नए लोगो का हर रोज आना है
जो अपने है सब वहीं है
बाकी हर रोज बदलता ठिकाना है
हर किसी को अपना समझती है
तभी तो समुंदर की बस्ती है

बहुतों को अपने अंदर समाया है
न जाने कितनों को अपनाया है
दूर कहीं से आता कोई
उसेको भी बहुत समझाया है
वो हर किसी को समझती है
इसीलिए समुंदर की बस्ती है

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