वो आईना लेके मुस्कुराते रहे।

वो लेके आइना मुस्कुराते रहें
हवाओं में थे एहसास सो आते जाते रहें

आईने से ही न जाने क्यों इतना शरमाते रहें
हर राज दिखा कर भी छिपाते रहें

हवा तो मुक्कदर थी,
आईने में सब नज़र आते रहें

सब जगह बेवजह आंखें फिराते रहें
वो लेके आईना चेहरा अपना सजाते रहें

न जाने आंखों से क्या भरमाते रहें
आंखों को कानों से सब बताते रहें

रेत की टक टकी हो या दरवाजों को आहट
भरी भीड़ हो या संसानाहट

कुछ किताब के बस खाते रहे
वो लेके आईना बस मुस्कुराते रहे

आवाज देने वालों ने तो बहुत दी
पर आईने में मशगूल खब्बों को सहूलियत दी

बूंदों को भी हवाओ में उड़ाते रहे
हर कोने की सूरत दिखाते रहे

एक एक बिखरे को संभालते रहे
खाली तैखाने को भी खंगालते रहे

आईने में जरा मशगूल थे
हम बड़बड़ाते रहे वो मुस्कुराते रहे

दुनिया को दरबदर कर
खबर की होते हुए भी बेखबर पर

फिजाएं थी एहसास थी सो आते जाते रहे
वो लेके आईना मुस्कुराते रहे।

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