किस किताब के शब्द हो तुम।

किस किताब के शब्द हो तुम
जो इतने दिनों से समझी नहीं
जितना खोऊं उतना उलझुं
ठिकाने की कोई कमती नहीं

आंखों से देखा बेहद सरल
समझने बैठी थी तुम्हे कल
न जाने किस दिशा में थे
न जाने किस फीजा में थे

घंटों तुम्हे देखती रही
खुद पर करूं में क्या यकीं
तुम यही हो या वहीं हो
दिमाक हो गया था बहुत सकी

आखिर कैसे समझूं तुमको
वाक्य में कैसे आरझूं तुमको
बहुत कठिन हो
बहुत गठित हो

तुम्हारे बिन सब बेकार
तूझसे जुड़ा हजारों शब्द का तार
जिसने बनाया बड़े ही यकीं से बनाया
तुझे शब्दों की दीवार में न जाने क्यों है चुनाया

किस दिशा में समझूं किस कदर मे सरल बनाऊं
नदियों सा कैसे तरल बनाऊं
बड़ी मशक्कत है बडी ही दिक्कत है
बनाने वाले की बड़ी ही सिरक्कत है

जरा कुछ जाहिर तो करो
सरल बनने में माहिर तो बनो
समझूं जरा मैं भी तुम्हे
क्या भरा है आखिर तुममें

उलझी किताब के शब्द लगते हो
जो भी हो इसीलिए इतना हजारों शब्दों में फबते हो।

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