बहुत सी बातें सफ़र पर है।

बहुत सी बातें सफ़र पर है
कुछ तो तेरी भी खबर पर है
खोना तो अब कुछ भी नहीं
बस रोना किस बात का है
सफ़र बस तन्हा रात का है

बहुत घूमती रही बेजान सी बातें है जेहन में
कुछ आंसू बन कर निकली
कुछ बनी रही सहन मे,
कितने इल्ज्जमों का बोझ है
उठना बैठना वहीं हर रोज है

शब्द खो चुके है समुन्दर भी डूब चुके हैं
हुस्न बहुत है मगर सब मोम को चुके है

कहें तो क्या कहें देखें तो क्या देखें
माथे पर उलझनों के रेखे
किधर कौनसी सीढ़ी कौनसा दरवाजा
अंदर से खाली उपर से सब है सजा

बहुत मुस्किल होती है जीने में
हजारों राख जली होती हैं सीने में
ऐसी ही नहीं इन्सान खबर रखता है
बिन खोए सब खो देता है
फिर भी सबर रखता है

सबका सताया हुआ
हर राज बताया हुआ
यूं ही नहीं कोई जिंदगी का असर रखता है
बहुत सी बातों का सफ़र रखता है।

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