सूरज चांद से जलता है।

सूरज चांद से जलता है
शीलता उसकी सूरज को खलता है

तभी तेज़ तपन करता वो
हर रोज़ चांद से लड़ता वो

दोनो रहते न कभी एक साथ
एक सुबह दिखता तो दूजा दिखता है रात

बड़ी तपन है सूरज में भी
शांत न रहे बदल के गरज में भी

सबकी चाह है चांद
लोग जाते हर किसी की दीवारें फांद

शीतल रोशनी निर्मल आगाज
समझ थोड़े पाएगा सूरज चांद का राज

चांद की चाहत सबको प्यारी
ठकवात चाहे जितनी हो
रोशिनि उसकी लगती है न्यारी

गुल्लर हो या रातरानी
क्या दृश्य लगता है चांदनी रात में
मंद हवाओ की आए रानी

सूरज बहुट उतावला है
गोरा भी जाए तो हो जाता सांवला है

उसे तो बस तपना आता है
तेज़ धूप मानो भ्राता है

सूरज चांद से बेवजह जलता है
सभी को चांद की रोशनी नही
सूरज की तपन खालता है
इसीलिए तो सूरज चांद से जलता है।

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