दिन बीता पर रात न हुईं।

साए से न जाने कैसी बात हुई
कुछ न होते हुए भी हार गए
मुलाकात हुई तो बस जजाबत से हुई
रात हुईं पर बात न हुई
न जाने किस घड़ी की शाम हुई

दूर खड़े थे खुले आसमान में
न जाने कैसी कश्मकश सी रात हुई
न आंख खुली न नींद पड़ी
तकलुफ से जान पहचान बस खाट से हुई

चमकते सितारे हस रहे थे खिलखिलाकर
ऐसी भी क्या सूरजमुखी बर्बाद हुई
खूब रुकी थी सरसरी हवाएं
रातरानी देखो कितनी आजाद हुई

न बात हुईं न रात कटी
चांद ने मूझसे लगाई थी टकटकी
करवटे भी लाज़वाब थी
बदलती रही रात भर वो भी न किसी तरफ़ टिकी

न सुकून पड़ा न हुई खड़ी
कई बातों की रातों में अकेली रही में पड़ी
साए में न जाने कैसी बात हुई
दीन तो बीता पर रात रात न हुई

बहुत छली थी फूलों की भी कली थी
सब कुछ था पर मात हुई
साए में न जाने कैसी बात हुई
दीन तो बीता पर रात रात न हुई।

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