मै ठहरना नहीं चाहती।

मैं ठहरना नही चाहती
नदी हूं में किनारे में कहां बहती,

देखो जरा मुझे कितना मर्म है मुझ में
मानव हो तुम कोई कर्म है तुझ में

बिलखती हूं में केहरती हूं मैं
कल कल धाराओं ही लहरती हूं में

क्यों मुझे मेला कर रहे हो
मुझ में ही अपना कुकर्म भर रहे हो

कुछ तो मुझे बचा लेने दो
तुम्हारी ही जरूरत हूं सफा रहने दो

बहूत बदला तुमने मुझे
बांधो का जंजीर चढ़ा है मुझ में

आजाद भारत मे भी हूं
थोड़ा मुझे भी तो शोर मचा जाने दो
समुंद्र है प्रेम मेरा उसमे मुझे समा जाने दो

देखो मुझे पुकार रहा है
रुख मोड़ने पर खूंखार रहा है

मुझे मेरे अंत में मिल जाने दो
रोको नहीं अब चले जाने दो

बहुत मैली हुई हूं में
पानी नहीं दलदलों में फैली हुई में

थोड़ा तो मुझे भी संवर जाने दो
समुंदर है मेरी रह उसमे तो मिल जाने दो

दक्षिण में कृष्णा उत्तर में घाघरा
यमुना है आगरा
तीस्ता बड़ी दुर्गम हुई
सबकी कहानी निर्मम हुई

अब न कहो कुछ बस मूझे बह जाने दो
रुकावट बहुत है बीएस समुंदर मे मिल जाने दो

नदी हूं मे ठहरना नहीं चाहती
रोको मत मुझे प्राकृति का नियम भी यही है कहती।

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