समझ कर भी नहीं समझ सकता है कोई

समझ कर भी समझ नही सकता कोई
जमाने तो मौजूद मगर ख़ुद नही रखता कोई
जरा सा ठहर कर देखो कोई
यूं हीं नहीं बेवजह सहता कोई

मालूम होता हर सख्श की शख्सियत
किधर जाती हर बार को उसकी नीयत
यूं ही नहीं नदी समुन्दर से है बिछड़ता है कोई
ख़ुद से ही हर वक्त लड़ता है कोई

मालूम होता की फितरत क्या थी
आखिर उसका बेहरत क्या है
सब जान कर भी हैरत थी मैं
तमाम गवाही उसकी रेहरत मे थी
वाकिफ नही किसी बात का था
धोखेबाजी जेहरत में थी।

जरा गौर से देखो ठहरेपन को
यूं ही नहीं चोट लगती गहरेपन को।
अरे कभी महसूस करके देखो
आंसुओ की सासें भर कर देखो
कभी रातें जग कर तो देखो
हर वक्त कसूरवार यूं ही नहीं कहती
ओठो की कपकपियां यूं ही नही रहती।

मालूम है समझोगे नहीं
झूठा ही सही दिल कभी रखोगे नहीं
चमकते चांद से भी ज्यादा मजबूर रहते हो
पास रहकर यूं दूर रहते हो

बस शिकवा एक बात की ही रही
खुब समझाया मैने पर समझे नहीं
कहते तो खुब थे जानते हो मुझे
दिल अपना मानते हो मुझे

कभी खेरियत मेरा भी ली होती
कुछ तो मेरा भी ख्याल किया होता

2 Comments

    • rashmidelhi 02/07/2021

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