मेरी शायरी – अरुण कुमार झा बिट्टू

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इतनी रफ्तार ठीक नहीं है।
कहा जाना है भाई।
चार ही दिन की हैं जिंदगी।
क्या उससे भी मन भर आयी।

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जीत कर भी कोई जीत पाता है नहीं।
मान देना हो तो वो याद आता हैं नहीं।
झुक जाती हैं नज़रे खुद सम्मान में उनके।
जो मिट कर भी बदी के संग जाता है नहीं।

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चट्टानों के वेग को भी अपने शौर्य से रोका है।
मौसम के प्रकोप को भी फूल समझ कर रोंदा है।
भारत मां के बेटे यू ही नहीं यूं जवाज होते हैं।
इनको तो इस धरती से प्रेम ने पग पग शीचा है।

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जीवन में खुशियां बहुत है हजूर।
ये होगा जब होगा मुहब्बत का सरूर।

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कहीं ना कहीं कोई कमी ही खालेगी।
घर में चाहे दौलत कितनी भी रहेगी।
करले मुहब्बत, थाम ले किसी का हाथ ।
ये जिंदगी हैं जिंदगी तभी तो लगेगी।

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मुश्किलें जिंदगी से खत्म नहीं होती।
उनसे निकलने का जतन करना पड़ता है।
जीतता नहीं है कोई जिंदगी में युही।
इसके लिए निरंतर प्रयतन करना पड़ता हैं।

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ऐ खुशी मुझको इतनी तू भाई ना होती।
जो गम ने आ कर मुझको रुलाया ना होती।

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ऐ गम तेरी मेरी क्या खूब जंग है।
तुझको है कि मुझको डूबने की जिद है
और हमको है कि उबर जाने कि जीद है।

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हा मेरे गरीब खाने का कोहिनूर हो तुम
मेरे बाबू मेरी जीवन मेरी उम्मीद है तुम
जब भी थक जाता हू जीवन की उलझनों से
तो कुछ करना हैं तेरे खातिर ये जनून हो तुम।

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देखो जी तुमसे नोक झोंक की मैं परवाह नहीं करता।
पर जब तुम बात नहीं करती हो तो बड़ी तकलीफ होती है।

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औरों से जंग में दिल हार नहीं सेहत है।
अपनों से जंग मे ये हार जाओ केहता हैं।
ये दिल के रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं साहब
यहां मै शब्द का भी स्थान नहीं होता है।

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वर्षों तलक मेरे शीने में धड़कता था वो।
जो कहता था में वही करता था वो
कल ना जाने उनकी नजरो से क्या गुप्तगू हुई।
अब मेरा इख्तियार मेरे दिल से खोने लगा है।

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वो कहते हैं जिंदगी में खुशियां नहीं है।
मैं कहता हू जिंदगी में खुशियां होती ही कहा है।
इसके लिए तो मन से सच्चा होना होता है।
और उम्र से कभी कभी बच्चा होना होता हैं।

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आज कल लोग क्या खूब दान करते हैं।
ले कर सेल्फी दान की निज मान करते हैं।
इससे तो अच्छा है साहब यू दन ना करो ।
गरीब के गरीबी का अपमान न करो।

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अहो भाग्य हिन्दू जन जन के
नैनन छलके खुशियां मन के।
पड़ी राम प्रभु मंदिर नीव
मोदी हाथ स्वर्ण की ईंट।

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आनंद मय पल है
खुशी का छन है
जय श्री राम
अब यही जन जन है।

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