मेरी शायरी – अरुण कुमार झा बिट्टू

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ए गुड़िया मेरी महफूज रहे।
जीवन के साल हजारों हो।
तू हस्ती रहे मुस्काती रहे।
चाहे पत्थर भी मुझे पिघलने हो।

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मुझे जिंदगी में बस इतने से कम है।
तेरी मुस्कुराहट तेरी चाहत मुकाम है।

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तू जैसी है जिंदगी बरी अच्छी है।
तुझ से मुहम्मद जो कर ली है।
तू खुशी दे या फिर गम बेशुमार।
बस मौज से हर रंग को जीनी है।

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बहुत मिलेंगी तुझ से भी सुंदर सरस योवान वाली।
बहुत मिलेंगी तुझ से भी गोरी लंबी सुमधुर प्यारी।
पर जो तेरा सेवा समर्पण है प्रेम दया और अर्पण हैं।
सिर्फ सोच सके जो मेरे लिए ऐसा निर्मल सच्चा में है।
वो ढूंढ ना पाऊंगा जग में क्या खाक मिलेगी इस युग में।
इसलिए मैं तुझ पर मरता हूं हा सर्वस्व समर्पण करता हुईं ।
सर्वस्व समर्पण करता हुईं ……….

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देश प्रेम रिवाजों को हरगिज नहीं भूलना है।
अपने देश कि सस्कृती को सीचना है बढ़ाना है।
भूल ना जाय अपनी सभ्यता इसलिए हमने ठऻना हैं
कम से कम एक लीवाज ही अपने वतन का सिलवाना है।

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ये मेरी जिंदगी तू कितनी खूबसूरत है।
बहुत दिया है तूने मुझे थोड़ा और की जरूरत है।
पर सुन धन दौलत कुछ काम हो तो भी चला लूंगा मैं।
पर अपने के मुहम्मद की तो ताउम्र जरूरत है।

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वो सुनहरे पल वो अनमोल यादे।
शहंशाह से रहते थे हर दुख से बेगाने।
वो अल्हर जवानी मदमस्त बाते ।
क्या खूब थी अपनी वो यारी वो यारे।
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मुहब्बत भी हो इबादत भी हो।
कभी कोई ग़म की ना आहट भी हो।
जहा रहना खुश रहना मेरे यार ।
तुम्हे अब सनम की आदत भी हो।

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ता उम्र जुटाया धन तो क्या
सर्वस्व जुटाया साधन तो क्या
पर वो जीवन ही स्वर्णिम है।
जो राष्ट्र हित के लिए जीया।

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जब जब देशद्रोहियों की फंडिंग कुछ अपने देशी पाते है।
बन कर के जयचंद वहीं गद्दारी वतन से निभाते हैं।

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कीमत पैसों की नहीं रिश्तों की होती है।
पर वो रिश्ता रिश्ता नहीं जिसमें मुहब्बत नहीं होती है।

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ये दिल खुश रहा कर
कब तक कमिया गीनवाएगा।
इस जीवन की शाम है आनि
जाने कब आ जायेगा।

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है गम की ये दुनिया कैसे मुस्कुराएंगे।
है सब यह दुश्मन कैसे जीत पाएंगे।
पर हार में भी जीत का आनंद आएगा।
जो संग संग तुम मेरे मनमीत आओगे।

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रहने दो कोशिश न करो जालिम।
ये मुहब्बत कहा छुपने पति हैं।
लव चुप ही रहे चाहे कुछ ना कहे।
पर नजरें तो सब बाया कर जाती है।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 29/06/2021

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