कुछ मेरा भी तो लिख जाने दो।

मुझे मुझमें ही खो जाने दो
कुछ मुझको भी पा लेने दो
कह रही थी मुझसे एक टूटती हुई कलम
कुछ मेरा भी तो लिख जाने दो

बड़े अरसों से खोई थी मे
एक बंद कमरे में सोई थी मे
अब उठी हूं तो ठहर जाने दो
कुछ मेरा भी तो लिख जाने दो

भिड़ थी कागजों में
शोर था आवाजों में
अब तो श्याही से लिपट जाने दो
कुछ मुझसे भी लिख जाने दो
कुछ मेरा भी तो लिख जाने दो

यूं ही नहीं उठती हूं मै
खुद ही खुद से रूठती हूं मैं
टूटने से पहले तो संवर जाने दो
कुछ क्षण की कली हूं में
अब तो कोई भंवर आने दो
कुछ मेरा भी तो लिख जाने दो

जिंदगी बिताई मैने किनारे किनारे
डूबी हूं बीच समुंदर जीवन के सहारे
एक तिनके से ही सही अब मुझे निकल जाने दो
आखिरी पड़ाव तक तो दिख जाने दो
कुछ मेरा भी तो लिख जाने दो

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