माँ की ममता

विधा:-गीत

युगों-युगों से नेह लुटाती तन-मन जीवन सींच रही है,
कौन समझ पाया जग में माँ की ममता का अंत कहाँ है?

स्वयं विधाता धरती पर जब तेरी कोख-जन्म पाता है।
राम-कृष्ण जग नाम रखाये तेरा ही सुत कहलाता है।।
माँ को छोड़ भला फिर दूजा और कहीं भगवंत कहाँ है?
कौन समझ पाया जग में माँ की ममता का अंत कहाँ है?

सुत-विक्षोभ वश विह्वल हो तब नेह नीर नयनों में भरती।
जने हुए की भूख मिटाने अपनी देह बेंच तक मरती।।
त्याग दया करुणा ममत्त्व में माँ से बढ़कर सन्त कहाँ है?
कौन समझ पाया जग में माँ की ममता का अंत कहाँ है?

पुत्र-मोह इस लाड़-प्यार की दीक्षा कहाँ मिली तू जाने।
अपने सुत की हर पीड़ा का श्रोत मर्म कण-कण पहचाने।।
माँ के ऋण से उऋण हुआ हो ऐसा भी कुलवन्त कहाँ है?
कौन समझ पाया जग में माँ की ममता का अंत कहाँ है?

युगों-युगों से नेह लुटाती तन-मन जीवन सींच रही है,
कौन समझ पाया जग में माँ की ममता का अंत कहाँ है?

-‘अरुण’

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