उस रोज़ हुईं थीं मुलाकात।

उस रोज़ फिर से हुईं थीं मुलाकात
दोहराई थी फिर से हर वही बात

पर कुछ बात अलग थी
भरी हुईं छत अकेली सी पलंग थी

एक मजबूत सहारा तेरा था
खोखला सा किनारा मेरा था

थे सामने दोनों ही बड़े ही चुपचाप अनजान
मानो नए नए हुए थे अनजान

बस नजरे बचा कर सब परख रहे थे
एक दूसरे के हालात के झलक समझ रहे थे

दिल में हलचल जुबां सख्त थी
भला कुछ कहते तो क्या कहते
इतने सालों बाद साथ कुछ वक्त रहे थे

अचानक एक गड़गड़ाहट आई
जैसे किसी तेज़ तूफ़ान की आहट आई

सिमटे दोनो के दिल एक जहां में
कह दिया सब कुछ की कितनी अकेला रहा मैं

बीती फिर वो रात तन्हाई
सुबह होनी थी फीर से जुदाई

सुबह हुईं चली फिर से ज़िंदगी
फीर से एक पहलू पर चादर ढकी।

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