न सागर न डागर।

न सागर न डागर
बूंद बूंद का है भवसागर
समझते जो तुम हो इसे
देखते हो तुम किसे

दूर तलक जायेगा ये
दो किनारे को बनाएगा ये
एक उस पार एक इस पार
देखो जरा दिखती हूं समुंदर का संसार

कुछ तड़पती कुछ भड़कती मछलियों का जाल
सभी का अपना अपना है ताल
सूरज की रोशनी बिखरती
चंद्रमा मे शीलता है पलती

देखो दोनो किनारों का बीच
कोई लकीर बीच न पाएगा खींच
चले उस ओर चले
गहराई की सींच बहुत है
चलो नापें उनकी तले

न सागर न डागर
संसार ही है भवसागर।

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