मिली तुझसे मैरी जो नज़र से नज़र।

मिली थी जो तुझसे नजर से नज़र
सब कुछ जानते थे फ़िर भी थे बेखबर,

आहट तुने दी आने की
नजरे मिली फिर झुकी आदत थी जो शर्माने की

दुनियां को भी हो गईं थी खबर
मिली थीं जो तेरी मैरी नज़र से नज़र

खुले बालों के साए
हवाएं भी आए जाए
बार बार समेटे बार बार खोले
कुछ हवाएं बोले कुछ आंखे बोलो

सूरज की ढलती रोशनी भी खुद को तोले
उड़ती पतंग तेरे इधर उधर ही डोले

चारों तरफ़ लग गए थे मेले
भीड़ बहुत बढ़ गईं थी
अब क्या वो दरवाज़ा खोले

धीरे से नज़र घुमाई
इशारों की मुझ तक सूईयां चुभाई,

कुछ दिल था कुछ वक्त था
कुछ ओठों का भी शब्द था

एक डोर के सहारे
हुस्न को सवारेंं
मिलो तुम मुझे सांझ और रात के किनारे

इतना बता कर वो शरमाई
हमने भी सोचा चलो अब तो बन ही गए जमाई

उसकी हुस्न की लालरी कुछ मुझ तक भी आई
थोड़ा हम शर्माए थोड़ा वो शरमाई

जमाने को भी अब तक खबर
मिली तुझसे मैरी नज़र से नज़र।

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