इंसान भी अजीब है।

इंसान भी अजीब है
मूरत बनाने वाले को नहीं मूरत को अजीज़ समझता है
सुख को नहीं हर ख्वाइश को पाना जीत समझता है
कभी खुद से कभी खुदा से लड़ता है।
खुद की गलती का कर्ज जिंदगी भर भरता है

इंसान भी क्या चीज है
पूरी दिख रही कायनात से नहीं
एक मूरत से आयात करता है

बड़े ही समझ कर बनाया होगा बनाने वाले ने भी
घर मैं पड़े ताले और मूरत की दीवाले को बेफिक्र समझता है

खैर यहीं तो खासियत है हम इंसानों की
कीमत मूरत की है ना की जानों की,

सबकी आस्था मूरत प्रेम
बच गया हो कुछ तो सूरत प्रेम
जो जितना ऊंचा वो उतना पहुंचा
अच्छा ही तो है कीमत क्या है आखिर इंसानों की,
मूरत समझते है आखिर माया भी तो है
कई सालों की
इंसान की कायनात वाकई बड़ी अजीब है,
कीमत भूसे की नहीं पर शिंप की है।

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