हकीकत से अब तक खोई हूं।

बिन तकिए के भी मैं सोई हूं
हकीकत से अभी तक खोई हूं

चली गईं थी जिस सफर तक
ख़ुद का न रही खबर तक,

दुनिया से दूर
खुदगर्जी से मजबूर

ले गई जिंदगी जिसका था एक दस्तूर
खुदा ने भी बनाया इतना मजबूर

हाथ पहुंचा खींच लिया
समुंदर ने भी पानी खींच लिया

खुद मे रह कर भी मैं मैं न रही
कहानी मेरी थी जरा अनकही,

थी सभी जैसी
दुनिया से कहती भी तो क्या कहती

सभी की एक जैसी कहानी थी
कुछ कही कुछ अनकही जुबानी थी

बस थाम कर बैठी थीं मैं
खोई खोई सी रहती थी मै

मुस्कुराहट तो ओंठो पर थी
दिल का बयान आंखों के चोटों पर थी

खुद को संभाल कर
शीशा जैसे कमाल कर

दुनियां को दिखाना था
जिन्दगी के चोटों से खुद को भी तो सिखाना था।

बिन आंसू के भी रोई हूं
बिन नींद के भी सोई हूं

अल्फाज नहीं की कैसे कहूं
इतना समझाने के बाद भी खुद को
हकीकत से मैं खोई हूं।

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