पंहुचा घर का।

दिल्ली से चले हम गांव
अपन घर अपने पांव।

जब देखेन हम नोएडा
चलत गाएन रोड़ा आय रोड़ा

अमेठी राहेंय बहुताए मीठी,
लाग गाए झोरा मां बहुताये चींटी

पेड़ा की नगरी मथुरा ठहरी

होजरी हम खोजेन बहूत
मेरिथिया मैं मोजेन बहुत

आगरा राहे मथुरा कै पास
उहां कै पेठा बहुतए खास

कानपुर गाएन चमड़ा बैचेय
उधर देखेन कुलिया भर कै कमरा बेचे
मिल आय मिल चलत हय भईया,
पैसा कमाओ जैसे दहिया।

लखनौवा कै कपड़ा देखेन
अंखाये आपन बुनाई से सेकेन
कपड़ा बड़ा चीक्कन पाएन
मूंगफली रेवड़ी साथ मयिहन लाएन।

सीतापुर महियान हनुमानगढ़ी
यिहा तो हमरा प्रशाद चढ़ी।

पहुचत पहुंचत पहुंचे घर का
अवध की नगरी दसरथ के लरिका।
राम राम जय सीता राम
उहां मिलत है दशहरी अमन के काम।

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