देखा एक ख्वाब मैने।

देखा एक ख्वाब मैने,
औरत थी वो पर बिन गहने।

विवाहित थी पर पराई थी,
पति और पिता से लड़ाई थी।

चली थी संसार मैं,
पड़ी थी मजधार मैं।

कन्यादान करवाई थी,
दुःख उसके जीवन कि दवाई थी।

घर था पर ठिकाना नहीं,
अनजान के घर जाना नही।

करती भी तो क्या करती
जीवन का मूल्य कैसे वो भरती।

आखिर बंधी उसी बेड़ी से,
निकली थी वो जिस खेड़ी से,

न दुनियां न पति न पिता,
बहु बेटी नहीं नारी थी वो
जिसे समझा जो गया था सीता।

पति पति है पत्नी एक नारी,
यही तो है दुनिया हमारी।

टूटा ख्वाब आई मैं भी वापस,
हकीकत ही तो है, सोचना जरा इस पर भी,
होगा तुम्हारे साथ भी बस कन्यादान के आसपास।

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