सिसकियों सी थी वो रातें।

सिसकियों सी थी वो रातें
याद आई थी बहुत सी बातें,
ओझल होती तस्वीरें सारी,
बढ़ती दूरियां रही थी जारी,
जब बेवजह बन गईं मुलाकातें।
सिसकियों सी थी वो रातें ।

ख्वाशियों को रही कुचेटती
लगी थी वो बेरहम चोट सी,
तर तर घायल बिन जख्म हुई थी,
हार मेरी केवल एक शक्स से हुई थी
सिसकियों सी थी वो रातें।
बेरहम सी भयी थी।

इंतजार की जगह फैसलों ने जो ली थी,,
तमाम उम्र की गुनाहगार जो बनी थी
तमाम लम्हें थे जो अनजाने हो गए
आंखो के आंसु भी बेगाने हो गए,
कुछ तो रहम मुझ पर भी कर जाते,
सिसकियों सी वो रातें।

मुस्कुराहटें के अफसाने हो गए थे
सिमट कर रह गई थी तमाम उम्र एक पहलू मे
जिस वक्त अपने ही मेखने पराए हो गए थे।
दूल्हे की बजाए जरूरी अब हो गई थी बारातें
सिसकियों सी वो रातें।
याद आई थी बहुत सी बातें।

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