झुकी सी आंखे।

झुकी सी आंखे,
शर्मायी थी पास आके,
चलते सफर मे
दिल के खबर मे,
मिली थी आकर मुझसे तुम
हो गए थे हम दोनो गुम

महीनों से सालो तक
मुझसे ज्यादा था तुम्हारा हक
सुबह से सांझ
हम भी थे कोई हीर और रांझ

न रखते थे वक्त का हिसाब
खोली थी खुशियों की किताब
बेहद से बेहद तक
दोस्त दुनिया हर पद

चले दोनो एक सफर मे
कर गई अलग एक डगर मे

न सिसकियां रहीं
न बातें हुईं
हुए अलग किस्मत की रहमत
आंसु बहुत पर बह मत
चलते रहो जीते रहो
दिल की बात दिल से कहो।

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