मुसाफिर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)


जिंनगी मोह माया के जाल में फँसल
चल चल मेरे मुसाफिर तूं बाहर निकल।

आए हम अकेले माता की गोद में
खाए और खेले माता की गोद में।
ये बचपन जवानी उन्हीं के नाम है
सेवा और भक्ति हम सभी के काम है।।
जो करते हैं मेहनत वो होते सफल
चल – चल मेरे मुसाफिर तूं बाहर…… ।

नहीं लाया कुछ भी नहीं ले जाएगा
खाली हाथ में कुछ भी नहीं पाएगा।
करनी जैसी भी हो फल मिल जाता है
डगर जितनी कठिन हो हल मिल जाता है।
बात बुजुर्गों की दिखती है कितनी अटल
चल – चल मेरे मुसाफिर तूं बाहर……..।

सहारा दे दो वर्ना तुम चुप ही रहो
अक्ल बाँटो मत ज्यादा गुप ही रहो।
खलक समझे तो अंधे की लकड़ी बनो
नहीं समझे तुम कुछ भी तो मकड़ी बनो।
दुनिया देखो तो कितनी गई है बदल
चल – चल मेरे मुसाफिर तूं बाहर……. ।

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