काहिल था मैं तेरे जमाने से ।

काहिल था मैं तेरे जमाने से,
बना जो हूं तेरे मेखाने से,
वक्त था जो ठहरा नहीं,
बुझ नहीं पाती आग मेरे जलाने से
जाहिल जो ठहरा तुझे पाने से।

न पानी न ठानी
बिखरते ही बस मानी,
उग तो हम यूं ही सकते थे,
उठा तो मै होश आने से,
काहिल था मैं तेरे जमाने से
बना जो हूं तेरे मेखाने से।

देख मेरा बहकना
देख ओशो का चहकना,
बुझे ओशो का भी देहकना
खो जाती है और पास आने से
काहिल था मैं तेरे जमाने से
बना जो था तेरे मेहखाने से ।

कभी देख कर ख्वाबों में ही डूबा करता था,
खुद ही खुद से लड़ा फिरता था,
लड़ा हूं आज मे तेरे सामने से,
काहिल था मैं तेरे जमाने से
बना जो था तेरे मखाने से।

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  1. joy 30/05/2021

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