दिन ढला अब रात हुई।

दिन ढला अब रात हुई,
तेरे मेरे मिलने की जो बात हुई,
सूई की धागे जो मुलाकात हुई,
दिन ढला अब रात हुई।

देख कर नजरों से भी
तेरी बारीकियत न आसान हुईं,
दोपहर दोपहर तक तो ठीक रहा,
पर चलो अब रात हुई।

टूटे से तो धागा टूटा,
आँख फिरी तो नाता टूटा,
बार बार कहने से न तुझमें अब वो बात रही,
दिन ढला अब रात हुई।

छूट छूट कर छूट गया,
आँखो का थकना भी टूट गया,
हुई न धागे से मुलाकात हुई,
दिन ढला अब रात हुई।

एक एक करता पल पल बढ़ता,
सूई से धागा कब तक न पड़ता,
थोड़ा सहारा थोड़ा किनारा,
ले धपाक से अगला सहारा,
चलो अब तो आँखें तेरी चमकदार हुई
दिन ढला अब रात हुई।

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