मन ये कहां अब चला रे।

चांद ये धरती जहां ये सितारे
तुझे पाऊंगा मैं खुद को ही मिटा के,
है हुस्न ये पत्थर अदाओं के फव्वारे,
पत्थर को पिघला कर कहां अब तू चला रे ।
देखो मन ये कहां अब चला रे।

है गुलाबों सी महक, जुल्फों को सवारें,
खिलती सी गलियां, रोशनदान के किनारे,
जागा हूं रात भर खिड़की के पास,
देखो मन ये कहां अब चला रे।

ये मौसम ये निगाहें, बहकती फिजाएं,
खिलती डूबती तो रहती है शमायें,
जला कर रखे जो वो हुस्न है तुम्हारे,
हम तो कबके बिन बरसे बुझ चले थे,
देखते ही रहते थे इसीलिए तो भले थे।
देखो मन ये कहां अब चला रे।

मेरी तरफ आए ये तेरी वफाएं,
गिरती समहलती ये तेरी है राहें,
ये मिटना ये गिरना ये समहलना बहलना,
खेलती हैं देखो कैसे तेरी मेरी निगाहें।
देखो मन ये कहां अब चला रे।

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