शयरी

देख कर ख्वाब भी हम औरों की तरह मुस्कुराते रहे,
दिन भर सोते और रात भर जागते रहे,
क्या पता था की भरी चांदनी से दोपहर भी होती है
हम तो भोर होने का बिगुल बजाते रहे।

जिंदगी को न जाने कहा हमने हैं छुपा दिया,
जीवन के हर किस्से को रंगमंच की तरह सजा दिया।
हर पल को एक नई वजह दिया,
हकीकत से शायद इसीलिए दूर है हम,
बेवजह को भी हमने एक वजह दिया।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 21/05/2021
    • rashmidelhi 22/05/2021

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