जाना था तो चला गया।

न मेरे पास कोइ वजह बची और न तुझमें वो बात रही,
तलब करती तो मैं क्या करती, अब वो जज्बात नहीं,
जाना था सो चला गया।
क्यों ठहरने का ख्याल रखती।

खत्म करा है मैने बचा हुआ भी,
बेवजह क्या तुमसे मैं आस करती।
रुकी थीं मै जब तक रुक सकती थी,
किसी की उल्फत में खोए हुए से क्या मैं फरयाद करती।
जाना था सो चला गया।
क्यों फीर को जाने का मलाल रखती।

जिसे खुद का ही होश नहीं, बीते जैसा अब जोश नहीं,
उससे क्या अब मैं बात करती।
आखिर जाना था उसे चला गया,
क्यों बीती बातें मे अपने जज्बात रखती।

किसी ओर का इंतजार था उसे
वक्त का भी मजार था उसे,
जब कल नहीं वो जिसमें वो,
उसे क्या मैं आज रखती।
जाना ही था आखिर चला गया।
क्यों सपनों का मै मिनार रखती।

ख्याल होना होता तो जाता ही क्यों,
फिर जानते हुए भी क्यों मैं अपने सवाल रखती।
जाना था सो चला गया।
नही रुकता सब कोशिसे बेकार थी,
आना होता
तो शायद मैं फिर से अपना दिल निकल रखती।

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