कभी तेरे कल की ओर ।

दिन कटे, रातें भी कटी,
इन्ही आंखो से मुझे दुनिया दिखी,
बेसब्र होकर जागती रही मैं,
वक्त ने कुछ मेरी भी किताबें लिखी
हा मानती हु जो आज है कल नहीं,
पर दुनिया से मैं भी हु सीखी।

देख कर दुनिया का रंग
सभी उसमे रंग गए,
लफ्ज़ दो लफ्ज़ ही रह गए,
दुनिया अपने मे सिमट गए,
तोल कर देखा वक्त के तराजू को,
अच्छे खासे भी बदल गए।

देखो जरा उस आह की नजरे भी डेह गई,
जो न बदल सकी वो वहीं तक रह गई,
है यही जमाना देखोरंग नया ले आता है,
खुद ही खुद मे बिछड़ा ही सिमट कर रह जाता है।

याद मे जो कल था वो कल न हम देख सके,
दोपहर धूप की झलक तुझको भी हम न सेक सके,
एक नया परिंदा जो अब उड़ चला है तेरे और,
रुख तू भी ले चला है देख कर पंछी की ओर।

वक्त से लड़ रहे है, खाक छान ते है तेरी और
चल चलते हैं मिलेंगे कभी तेरे कल की ओर ।

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