वक्त से बेवक्त।

खुद से कहूं या तुझ से कहूं,
तेरे सिकवें मैं कितना सहूँ,
वक्त से बेवक्त तक कितना मैं लडू,
इससे भला तो यही है,
की कुछ भी न मैं कहूं।

देर रात तक अक्सर मैं
बस यही सोचा करूं,
कब तक
यूं अंधेरी फिजाओं मे बहु,
किस्मत की समझूं
की है ये तेरा जुनूं।

बेहकती फिजा मैं बहु,
की मूर्त मैं सजू,
भोर से चांदनी तलक
बता मैं कब तक रुकु,
खुद से झुकू या दुनिया मैं झुकु।

दुनिया मैं बनू,
की दुनिया मैं साजू,
असमा से उठ कर,
बता जमीं मे भी न गिरू,
अब मैं तुझ से है
ये आखिरी सवाल है करु,
क्या कल वो थी जो आज मैं हूं।

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