जनाजा सहुं ।

तुझ पर कैसे अब मैं गवारा करू,
तेरी मलकियत को कैसे मैं संवारा करू।

अपना से गैरों तक का सफर है जो ये तेरा,
बता हर इलाजमो पर कैसे मैं उजाला करू ।

कैसे खुद से ही हर वक्त मैं लडू,
खुद से ही खुद मैं अब और कितना मैं गिरूं।

आंखे थक चुकी है बरसते बरसते,
गीली ही पलकों पर कैसे बूंदे मैं धरू।

बड़ा आसान होता है कुछ भी कह जाना,
खुद की मासूमियत पर शब्द कैसे मैं कहूं।

इसे मैं गिराना या इसे उठाना समझूं,
कब तक यादों का जनाजा मैं सहूं।

इंसान तो मैं भी ही कोई खुदा की मूरत नहीं,
बता हर वक्त बेहिसाब जमानत मैं कैसे भरूं।

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