ओ नारद ।

ओ नारद
क्यों बढ़ रहा है दुखों का प्रारब्ध।
सुख की छाया विरल हो गया,
दुख का साया सरल हो गया।
हर दिशा जलती जलती काया,
हर चोखट मर्म हो गई।
धर्म अधर्म हो गई,
अंधकार साकार हुआ,
शमशान आधार हुआ।

ओ नारद,
मेरा द्वार अब तु बंद पाएगा,
खोलूंगी खुसियों की बारात लायेगा,
अकाल जब शून्य तक जाएगा,
प्रकृति जब फिर से छाएगा,

ओ नारद तब
तू मेरा द्वार पाएगा,
दुख सुख दोनो सिक्का बन जायेगा,
ओ नारद तू तब घर पाएगा ।

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