शर्म करो । शर्म करो ।

शर्म करो, शर्म करो।
लाशों पर मीनार,
ये न अधर्म करो,
देखो जनता कराह रही है,
पानी तो पानी,
हवा को भी तरस खा रही है।

जनता की रक्षा धर्म है तुम्हारा,
कुछ तो राजा का कर्म करो,
शर्म कर शर्म करो।

चारों ओर त्राहि त्राहि है,
प्रकृति ने ये कैसी कहर मचाई है,
कुछ तो जनता का उद्धार करो,
शर्म करो शर्म करो,

जनता भूखी है रोटी देख,
लाशे जलती घर घर एक,
कुछ तो कर्म करो तुम भी नेक,
मीनार नही, जनता बचाओ,
समय होंगे फिर अनेक,

शर्म करो, शर्म करो।
जनता का तुम पर कर्ज अनेक,
खुद की मिट्टी, तुम्हारे नेक,
देख जरा भारत की काया देख,
बना दिए दीवार तूने,
नीचे है लाशों के ढेर।
शर्म करो शर्म करो।

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