मंगलवार का प्रशाद ।

वैसे तो दुनिया मे अलग अलग थे के लोग रहते है सभी की अपनी अपनी मान्यता और धारणाएं होती है। सभी अपने अनुसार जीना चाहते है। कोई कुएं से पानी भरना चाहता है तो कोई नलकूप से। कोई गाय चराना चाहता है कोई बैल से कोल्हू चलावना चाहता है।
इसी तरह कुछ व्यंग भरें प्रसंग मुझे अपने अलौकिक आंखो को भी देखने को मिले है उसी मैं से एक व्यंग मेरे मामा के गांव की एक बुजुर्ग व्यक्ति की है। नाम उनका रामप्रसाद था। था के मतबल की अब वो अपना सम्पूर्ण जीवन और भगवान के लिखे के अनुसार इस दुनिया मे नही रहे।
उनके दो बेटे जिनका नाम धनीराम वा छोटेराम दोनो ही बेटो के नाम उन्होंने भूत सोच विचार कर रखा था। और सक्त भी उसी प्रकार रहते है जैसे बचपन का तरबूज का बाहरी भाग। रामप्रसाद जी अपने बात के बड़े पक्के थे।
उन्होंने इस बात के सबूत का चिट्ठा भी पूरे समाज मे एक दिन खोल दिया। हुआ यूं कि उन्होंने अपने बेटे शादी अपने दूसरे गांव की लडकी से तय कर आए थे। और बात पक्की करने के लिए छिदना भी दे आए थे। जैसे तैसे एक महीना बीता। अचनक उनके गांव के एक मित्र अगाये कान भरने
उन्होंने यूं कहा की “तुम्हारे होने वाले समधी कह रहे थे की
तुमने भूत दहेज लिया है।”
रामप्रसाद जी असमाजांश मे पड़ गए उन्होंने एक एक करके सब गिनाना शुरू कर दिया ( हम गए थे तो उन्होंने मैं बताशा खिलाया दस रुपए का , पानी कौन सा खरीदने जाना था उन्हें, बेटे के छिदना मे खर्च किया उन्होंने दस रुपए दो किलो मिठाई एक किलो केला इस तरह उन्होंने अभी की गिनती शुरू कर दी ) उनके मित्र न कहा ऐसी बात है तो ये आज इस तरह कह रहे है कल न जाने क्या क्या कहेंगे” रामप्रसाद जी एम कहा बात तो तुम ठीक कह रहे हो और फिर झूठ झूठ होता है। उन्होंने तुरंत साइकिल के पंडाल घुमाया और बैठ कर निकल लिए दो घंटे मे पहुंच गए होंगे। उन्होंने न आव देखा न ताव उन्होंने कहा मैं तुम्हारी यहां से शादी नहीं कर सकता ये लो जितना तुम्हारा खर्च हुआ लडकी वाले समझते ही रह गए और वो साइकिल चला कर निकल लिया मानो कितना बड़ा बोझ हलक कर दिया हो अपने मन का। इसी तरह से उनके बहुत से निस्थावादी धारणाएं मालूम है।
खेर मैं अपने पसंद पर आती हु। जो उनके जीवन मैं मुझे बेहद अच्छी लगी। शायद ही कोई व्यक्ति इतनी बड़ी मान्यता या सोच रखता हो –
“उनकी एक आदत और थी मंगलवार के प्रशाद”
वो हर मंगवलावर को वे पांच रुपए अपने जेब से निकलते थे। और उनके गांव के बाहर एक मंदिर उन पांच रुपए को लेकर जरूर जाते थे। ये उनका नियम था। और जाते भी थे वो तो सांझ के समय जिससे जितने लोगो को प्रशाद चढ़ाना हो चढ़ा दे। विशेषता तो ये थी कि वो एक ही पंडित और एक ही मंदिर पर जाते थे।
एक दिन उनके साथ उनके एक साथी भी गए
उन्होंने न कहा उन्होंने यानी की रामप्रसाद जी के साथी ने की आज चलो दूसरे मंदिर चलते है
कभी कभी भगवान के स्थान भी बदल देना चाहिए।
रामप्रसाद जी एम कहा नही तुम्हे जाना है तो मैं रोकूंगा नही
पर मेरे पंडित से यहीं की बात पक्की हो रखी है।
उनके मित्र न पूछा ऐसा कुछ खास है क्या
क्या वो तुम्हारे लिए अलग से पूजा करवाते है या अलग से तुन्हे गद्दी देते है। रामप्रसाद जी एम कहा ऐसा कुछ भी नही होता होता है। उनके मित्र ने कहा आज तो फिर हम तुम्हारे साथ ही चलेंगे प्रशाद जी एम कहा चलो।
मंदिर गए और वहां पंडित जी एम कहा आ गए प्रशाद जी प्रशाद लेने। प्रशाद जी ने हाथ जोड़ कर कहा हा आ गए
पहले हाथ जोड़ा फिर अपने कुर्ते की जेब से वही पांच रुपए निकाले जो वो घर से लेकर आए थे हमेशा की तरह
पंडित जी के हाथ मे थामा दिया फिर पंडित जी ने एक झोला उन्हें भरी करके दिया और मंदिर के बाहर आगए।
रामप्रसाद जी न झोला खोला और कहा इतना सारा प्रशाद
रामप्रसाद जी बोले हा इतना सारा । रामप्रसाद जी के साथी बोले पंडित से कोई साठ गाठ है क्या रामोरहदाद जी न कहा नही उनके मित्र न कहा की इतना प्रसाद तो मुझे कबी नही मिला
रामप्रसाद जी बच्चों मे वो प्रशाद बाटते हुए। मैं मंदिर जाने से पहले 5 रुपए के प्रसाद लू फिर उसे मंदिर मे चढ़ाऊ उसके बाद मुझे एक मुठ्ठी भर प्रसाद मिले और जो वहां चढ़ा हुआ है उसे रात मैं किसी किनारे कूड़े में फेका जाए और जब मुझे प्रशाद खरीद कर ही खाना है तो मैं पंडित से ही न खरीद लू । इससे कई पुण्य मुझे मिल जायेंगे
एक तो पंडित से खुश की उन्हें दक्षिणा मिली है
दूसरा भगवान खुश की मैं प्रशाद बाट रहा हु
तीसरा बच्चे खुश की उन्हें आज नुक्ति मिली है खाने को।
सब जगह मैं खुशी ही बाटी सोचो मेरी खुशी उनके आशीर्वाद से बढ़ेगी की नही
उनके मित्र भूत आचार्य हुए की इतना बुद्धि लगाई तो लगाई कैसे ।

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