शायरी।

१.
बहुत हुई अब शिकायते,
बहुत हुए गिले सिकवे,
दूर आखिर जाना ही है तुझे,
फिर क्यों तेरे आगे ये मोहब्बत झुके।

२.
पाया तो भी मेने कुछ,
फिर भी खोने का मुझे डर था,
अब जिंदगी ही चली गई
दिल जलना क्या कम था,

तू भूल गया है शायद,
इस बात को,
जिस कदर जलाया है तूने मुझे,
उसमे आग जरा काम था।
लुटेरों ने भी मुझे तब लूटा,
जब दीए मे भी तेल कम था।

इस कदर जलाया है तूने मुझे,
जिस कूऐ मे गए हम,
वो पानी नही छल था,
और क्या अब मे जमाने से लडू
जमाना भी कमभखत तुझ से था।

देख जरा गस्ति मेरी भी,
क्या खवाबो की हस्ती कम थी,
चेहरे का सीसा भी ले गया,
की जमाने का देखना भी कम था,
डुबोया भी है तूने उस जगह जहां,
आग का पानी भी कम था।

३.
मैं तुझ से तो हूं
पर तू मुझ से नहीं
कोशिश तो मेने बहुत की
प्यार तो तूने किया
पर कभी तूने मुझे अपनाया नहीं

४.
जहां छोड़ा हाथ छोड़ा,
जिंदगी का हर मुकाम मेने तोड़ा,
छोटी छोटी खवाइश से मेने ,
जो आसियान था जोड़ा,
क्या पता था कोई तूफान भी आयेगा,
वरना हस्ती बनाने के लिए तो मेने,
खुदा को भी छोड़ा।

एक बार कह,
देता की नफरत है तुझे मुझसे,
आदत खत्म कर देती,
क्योंकि मोहब्बत है मुझे तुझसे ।

देख जरा मेरी हालत,
पागल पागल सी रहती हु,
न रात भर सोती हु,
दिन भर बस रोती हूं।

हमें पता था खुदा मोहब्बत मैं सजा देगा जरूर,
कोई करीब जुदा होगा जरूर,
कातिल तो जमाने को समझते थे हम,
पर क्या पता था कि
कोई अपना भी दगाबाज होगा जरूर।

तू रात भर सोता रहा,
मे रात भर रोती रही,
किस्मत कि ख्वाहिश तो देखो,
जितना दूर तू होता रहा.
उतना मे तूझमे खोती रही।

अपने तो कभी अपने ही थे,
गैर भी कभी अपने थे,
वक्त कि रेत भी ऐसे गिरी,
दुनिया तो क्या,
खुद भी पराये हो चले।

तुम चाहे जितना मोड़ों मूं,
तुम्हे छोड़ा भी नहीं जाता है,
अपना समझा इस कदर
तेरे बिछड़ने पर रोया भी नही जाता।

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