बिन कुएं का पानी ।

तू आया था उन बादलों की तरह ,
जो बरस कर चला गया,
धरती फिर भी प्यासी रही ,
बिन पानी रेतीले इलाकों तरह।

आया तो था,
बिन कही बातों की तरह,
जरा सी हवा ले गई तुझे,
तेज तुफानो की तरह!

ऐ हवा कबी आ ठहर कर ,
कुछ जी लू मैं तुझे भी ,
क्यों बुझ जाता है तू ,
लिखे हुए रेत मैं अफसानों की तरह!

कभी मेरी भी प्यास बुझे,
कबी तो सुनाऊं दिल का हाल तुझे,
देख जरा कबसे रुकी हुई हूं,
तू क्यों भागता है क्रजदारों की तरह!

देख जरा मेरा भी और,
धरती हु मै तेरी,
कर दे इस तरह मुझे,
फूल सी मेहकू ही और,
बना दे मुझे भी भगदारों की तरह।

अबकी आ तो बरस के जा
रहूं न मैं विरानो की तरह
तरस गई हु
में बिन पानी के कुऐ कि तरह ।

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