शिशा ।

एक शिशे ने दूजे शिशे से पूछा,
तूझमे और मुझमें फर्क क्या है
तेरा आकार ही मेरा आकार एक
फिर एक दिशा मे रहने मे हर्ज क्या है
तू भी दिखाता काया कि चमक
मै भी दिखाता चेहरे की दमक
तेरा और मेरा तरज क्या है।

तूझे देख यूं सज संवर लू,
अच्छे बूरे मे फर्क समझ लू
यही तो प्रकृति ने सिखाया है,
इसमे हम सब का कर्ज क्या है
तेरा सहारा दीवार है
मेरा सहारा संसार है
फिर एक होने मे मर्ज क्या है

तू देखता बंद घनेरा
मै देखती रात अंधेरा
तू दिखाता संसारिक माया
मै दिखाती क्या बदलाव है आया
आखिर तूझमे मुझमें फर्क क्या है

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