लक।

मे तूझमे मिलती अगर
तूझमे कल वाली वो तलब होती,
तू किसी ओर कि बालों .का फूल है अब
वरना तेरे संग तो मे खूदा तक रहती।

हर आंसुओं मे बहती
मुस्कान मे सजती
अगर तू मेरे लकीरों मे होता तो
एक घर क्या पूरे जहाँ से लडती
पर अफसोस नसीब तो नसीब
तेरे दिल मे जगह नही अब
वरना मौहब्बत तो इस कदर करी है हमनें
तेरे पल भर कि हसी के लिए
कबरिस्तान मे भी रहती।

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