मेरा पहला-पहला प्यार..!

मेरा पहला-पहला प्यार..!

” सुबह से शाम होती है, बेबसी आम होती है,
तेरी यादों में इस क़दर अब ज़िन्दगी तमाम होती है,
झाँकता हूँ झरोखों से कि शायद गुज़र तेरी होगी,
मुसाफिर जब-जब राहों में..हसीं अनजान होती है। ।१।

महकते यार के नूर से, है कुदरत नवजवां सारा,
जमीं से लेके आसमां तक, फैला महक़मा सारा,
है झुकता चाँद भी सज़दे में, एक नया रंग चुराने को,
यकीनन सादगी से दिन फ़िज़ा में परवान होती है। ।२।

नहीं शौकीन हो गया हूँ, मैं किसी पैमाने का,
नहीं यारी निभाता हूँ, दर्दे-अजीज़ मयखाने का,
फिर भी होश कहाँ दिल को, महज़ खुमारी रहती है,
ज़िन्दगी..बग़ैर मय..मदहोशी में बदनाम होती है । ।३।

सोचूँ, दिल पे क्या गुज़रेगी, जब यार की दीद होगी,
शायद ज़िन्दगी की मेरी.. वो आखिरी ईद होगी,
हालत..यूँ होगा कि लफ़्ज़ों में अल्फ़ाज़ नहीं होंगे,
हाले-दिल..राजे-दिल..निग़ाह से बयान होती है। ।४।

महज़बीं यार की सुर्खी, हया, अल्फ़ाज़ बन जायें,
वो उठती-झुकती हुई गुस्ताख़ निगाहें दवात बन जायें,
मचलते अरमानों की शबनमी फिर कलम उठाकर अब,
‘शिकन’ के दर्दे-दिल पे उस ख़ुदा की कलाम होती है ।५।”

-✍️सुहानता ‘शिकन’

Leave a Reply