नानी माँ ।

हाँ मुझे याद है,
तेरे आने वो कितना भागती थी,
कभी रसोई कभी आंगन,
कभी चौराहे पर हो आती थी।
रात अंधेरी बागो से वो
मिठे आम तोड़ लाती थी।
वो ही मेरी नानी माँ थी।

हाँ मुझे याद है,
तेरे दरवाजे तक आने मे,
कई मील वो चल आती थी,
घूटनो कि लाचारी से
आंखों से आस लगाती थी।
तूझे लेने
अपनी लाठि तक वो भूल आती थी,
माँ वो ही तो मेरी नानी माँ थी।

कभी मिष्ठान कभी रस का खान
हर ख्वाहिश वो तोड लाती थी
भरी जेठ में
सांझ का मक्का जरूर भून लाती थी
जब भी जाना हो मेले मे
तिजोरी वो अपना तोड आती थी ,
वो ही मेरी नानी माँ थी।

हमारे घर से जाने पर
हर घर का कोना खंगाल कर
झोला वो भर जाती
वो ही तो मेरी नानी माँ थी।

Leave a Reply