काश की तुम समझ पाते की तुम सिर्फ आम आदमी हो

 

काश की तुम समझ पाते की तुम सिर्फ आम आदमी हो ! मालूम है क्यों !
क्योंकि तुम सिर्फ आम आदमी हो ! तुम्हे खास होने का नशा कराया जाता है
तुम से बोला जाता है पास आओ , तुम्हे ही बलि का बकरा बनाया जाता है
तुम से बोला जाता है भीड़ जुटाओ ! तुम्हे ही जिम्मेदार बताया जाता है
तुम से बोला जाता है आंदोलन में आओ ! तुम्हे ही पहले ठगा जाता है
तुम से बोला जाता है मयखाने खुले हैं ! तुम्हे ही मुजरिम बतलाया जाता है

 

काश की तुम समझ पाते की तुम सिर्फ आम आदमी हो ! मालूम है क्यों !
क्योंकि तुम सिर्फ आम आदमी हो !तुम्हे बड़े होने का झूठा एहसास कराया जाता है
तुम ही तालाबंदी का दर्द झेलते हो तुम्हारे माथे पर फ्री राशन का ठप्पा लगाया जाता है
तुम्हारा व्यापर जमता भी नहीं है ! पहले टैक्स चोरी का जिम्मेदार ठहराया जाता है
जब तुम दवाई हॉस्पिटल मांगते हो तो तुम्हे पहले मृगमरीचिका में फंसाया जाता है
तुम जब फिर भी जब जिद करते हो , तो तुम पर पुलिसिया डंडा चलाया जाता है

काश की तुम समझ पाते की तुम सिर्फ आम आदमी हो ! मालूम है क्यों !
क्योंकि तुम सिर्फ आम आदमी हो !तुम्हे अपनेपन के ढोंग में फंसाया जाता है
रोजगार , मजदूरी , धंधा , सड़कें , हॉस्पिटल, शिक्षा ,बराबरी , हवा , पानी
तुम्हे मांगते – मांगते जमाना गुजर गया मगर तुम्हे आज भी क्या मिलता है
सिर्फ हिन्दू , मुस्लमान , जाती , आश्वाशन की चाशनी में डूबा हुआ झूठ !

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