आ चल चले कहीं।

आ चल चले कहीं,
बादल के छाव मे
कि ढूंढ न पाये कोई ,
जमीं और आसमां मे।

रात अंधेरी यू कटतीं ही नही
धूप भी गहरा की छटती ही नही ।
आ ले चल चले कहीं,
सुबह और रात मे,
जो ढूढती है तू ,
वो है तेरे सांझ मे।

कांटो मे है पांव ये तेरे
तू दौडना चाहती है ,
फिर क्यों चलती भी नहीं।
आ चल चले कहीं ,
फूलों के बाग मे
जहाँ मुस्कुराये तू
उस जहाँ मे।
आ चल चले कहीं ।।।।

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