शून्य से क्षितिज तक

कभी मेरी चकाचौंध,
तेरी आँखों में ही रहती थी
तू दूर गाँव में रहता था,
फिर भी तू मुझमें बसता था,

मेरी विरल चाँदनी तेरी आँखों में
तेरे घर को रोशन करती थी ,
जब भी आता था मेरे उजाले में,
चंचल .काया पा लेता था ।

अब जो हैं वो भी चले गये,
उनका दूर गाँव बस मन मैं है
मैं लाख दिखाऊं चंचलता
घर उनके दोनों कंधे हैं
वो जा रहा छोड़ कर
जो मुझमें सपने पा लेता था ।

2 Comments

  1. Harry 23/04/2021
    • rashmidelhi 23/04/2021

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