शून्य से क्षितिज तक

कभी मेरी चकाचौंध,
तेरी आँखों मैं ही रहती थी
तू दूर गाँव मैं रहता था,
फिर भी तू मुझमें बसता था,

मेरी विरल चाँदनी तेरी आँखों मैं
तेरे घर को रोशन करती थी ,
जब भी आता था मेरे उजाले मे,
चंचल .काया पा लेता था ।

अब जो हैं वो भी चले गये,
उनका दूर गाँव बस मन मैं है
मैं लाख दिखाऊ चंचलता
घर उनके दोनों कंधे है
वो जा रहा छोड़ कर
जो मुझमें सपने पा लेता था ।

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