न वक्त से हुआ, न गुलजार से हुआ,
कलाम तो दुखी जाहान से हुआ,
तडप के रह गये खुले परिन्दे के ताराजू
खुदा भी उनका गुलाम जो हुआ ।

न गुल अपना न बदन अपना,
न ये कम्बख्त बेगम अपना,
न जाने कैसी मोहब्बत करी हमनें,
रहा न खुद का जालिम दिल भी अपना

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