कान मेरे बजने लगे हैं………………………….देवेश दीक्षित

नोट :- (ये कविता तब की लिखी गई है जब पिताजी की तबीयत खराब थी )

 

पिताजी हैं बीमार

सेहत पर हुआ वार

हर मिनट में बुलाते रहते है

पूछने पर कुछ बता नहीं पाते हैं

कानों पर हुआ इस तरह कुछ आघात

नहीं भी बुलाते पर लगता दे रहे आवाज़

उन्हें सुनने के लिए जाएं

तो मना कर दें बिना हिचकाए

मैंने नहीं बुलाया है

यही सुनने में आया है

एक बार नहीं

दो बार नहीं

कई बार हुआ है

हर बार हुआ है

लगता है जहन में बसने लगे है

कान मेरे बजने लगे हैं

 

इस स्थिति का मुझे

हुआ कुछ ऐसा आभास है

जैसे मेरी सोच में

लगा अल्पविराम है

क्या लिखूं क्या न लिखूँ

ये सोचकर बेहाल है

जब भी कुछ सोचने लगता हूँ

आती उनकी आवाज़ है

अंदर से झुंझला जाता हूँ

जब पड़ता बार – बार व्यवधान है

पूछने जाता हूँ की क्या हुआ

तब मिलता नहीं कुछ आदेश है

फिर कुछ सोचने लगता हूँ

कलम को तैयार करने लगता हूँ

फिर लगता है आवाज़ देने लगे है

कान मेरे बजने लगे हैं

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देवेश दीक्षित

7982437710

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