रहने दो

जो लबों तक आकर लौट जाते हैं,
दिल की दीवारों से टकराते हैं,
दिमाग की सलाहों में उलझ जाते हैं,
जज़्बात ही तो हैं…. कहने दो |

किया तो था बयान बार-बार,
पर शायद तुमको याद नहीं |
अब जो राहें अलग हो चुकी,
न कहो साथ चलने…मुड़ने दो |

हाथों से कुछ कुछ छूट रहा,
शीशे सा कुछ टूट रहा |
जो आँखों से छलक रहे,
आंसूं ही तो है…बहने दो |

कभी और लगाएंगे हिसाब-किताब
क्या खोया और क्या पाया,
थोड़ा खुद को समेट तो लूँ,
अभी कुछ न पूछो….रहने दो |

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