नक़ाब

कभी फेसबुक पोस्ट के लिए,
कभी इंस्टा की स्टोरी के लिए,
रंग-बिरंगे ‘फ़िल्टरस’ की आड़ में,
‘लाइक्स’ और ‘कमैंट्स’ की चाहत में,
हम रोज़ नक़ाब बदलते ही हैं |
अब तो खुद पर आयी है,
क्यों न एक नक़ाब और सही ….

वैसे भी रोज़मर्रा की भागम-दौड़ में
पडोसी, रिश्तेदारों, बॉस के लिए,
कभी दोस्तों और घरवालों के लिए,
हम अलग-अलग नक़ाबों में ढलते ही हैं,
अब तो खुद पर आयी है,
क्यों न एक नक़ाब और सही ….

सतह पे सतह, सतह पे सतह,
अब तो ये भी याद नहीं,
कब कौन सा नक़ाब पहना, कब उतारा था |
और करते भी क्या
बताना थोड़ा और छुपाना ढेर सारा था |
फोनबुक और फ्रेंडलिस्ट नकाबपोशों से आबाद है |
खुद का असली चेहरा भी अब धुंधली सी याद है |
चलते-फिरते अपना रंग-रूप बदलते ही हैं,
अब तो खुद पर आयी है,
क्यों न एक नक़ाब और सही ….

एक कपडे का टुकड़ा ही तो है,
क्यों इससे कतराते हो |
कभी गले पर तो कभी नाक के नीचे लटकाते हो |
कुछ उतारना ही है तो निकालो उन् मखौटों को,
जो जाने-अनजाने चढ़ा लिए हैं अपने असली वजूद पर |
अब तो खुद पर आयी है,
कम से कम इस बार नक़ाब तो है सही |

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