हवा हूँ मैं

न दिखती, न सुनती, न थमती,
ऐसी घटा, ऐसी सबा हूँ मैं…
बिन डोर की उड़ती पतंग हूँ मैं
अपना साहिल, अपनी तरंग हूँ मैं
पूछते हैं मुझसे कि क्या हूँ मैं
हवा हूँ मैं, हवा हूँ मैं …

निरंतर बजता तराना
बिन अंजाम का फ़साना
सन-सन चलती पुरवाई,
सुबह की पहली अंगड़ाई,
मत ढूंढों मुझे कब और कहाँ हूँ मैं
हवा हूँ मैं, हवा हूँ मैं…

खींचती अपनी हथेली की लकीरें,
हैं मेरी अपनी तक़दीरें, तदबीरें
मेरा अपना रास्ता, मंज़िल, काफिला,
न मैं सीता, न अहिल्या, न उर्मिला..
बेनक़ाब, बेकाबू, बेपरवाह हूँ मैं
हवा हूँ मैं, हवा हूँ मैं, हवा हूँ मैं …

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