।। जय माँ जगजननी।।


जगजननी माँ संकटहारिणी,दुःखविनाशिनि तुम्हें प्रणाम।
ऐसी दया करो हे माता, प्रतिपल जपूँ तुम्हारा नाम ।। 1 ।।
संकटहरिणी, कष्टनिवारिणि, जगजननी माँ जग की माता।
तुम्हारी ही दया से माता, जग मे सब है संभव हो पाता ।। 2 ।। I
सुर नर मुनि सबसे तुम पूजित, सबका तुम करतीं कल्याण।
भवसागर की महाविपत्ति से, तुम ही देतीं जग को त्राण ।। 3 ।।
भक्तजनों की मैय्या, हो तुम ही एकमात्र उद्धारक।
उत्पत्ति प्रलय और विनाश की, केवल तुम ही कारक ।। 4 ।।
सिंहों पर हो आरूढ़, भक्तों को देतीं तुम अभय ।
भक्तों की बन उद्धारक,करतीं दूर सभी का भय ।। 5 ।।
खण्ड, त्रिशूल गदा धारण कर, असुरों का करतीं संहार।
असुरों को उनके धाम भेजकर, संतों का करतीं उद्धार ।। 6 ।।
तुम्हारे हाथों प्राण त्यागकर, असुरों ने पाई सदगति।
शुम्भ, निशुंभ, महिषासुर आदिक, दुरमतियों की दूर हुई दुर्मति ।। 7 ।।
सरस्वती रूप से तुम्हारे माता, सद्बुद्धि की होती प्राप्ति।
लक्ष्मी रूप को कर धारण, देतीं धन वैभव और ख्याति ।। 8 ।।
दुर्गा रूप में हे जगजननी, शक्ति स्वरूपा तुम कहलाती हो।
असुरों को वांछित लोक भेजकर, संतो को अभय दिलाती हो ।। 9 ।।
जिस भाग्यशाली जन पर, दयादृष्टि तुम्हारी हो जाती।
रंक से वह राजा बन जाता, कमी न कोई रह पाती ।। 10 ।।
निज भक्तों पर करो दया, जीवन सब भाँति रहे परिपूर्ण।
ध्यान तुम्हारा कभी न बिसरे, कुछ भी न रहे कहीं अपूर्ण ।। 11 ।।

अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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