जाड़े की धूप

उजली, धुली, चमकती धूप,
छत पर है उतरी-उतरी |
खिड़की की सलांखों से,
मेरे घर में है बिखरी-बिखरी |

बलखाती और इठलाती,
चलती है यूँ पुरवाई |
मानो कारी रात के बाद,
हुई सुबह निखरी-निखरी |

भीना-भीना, मीठा सा,
लोरी सा कुछ सुनता है,
धीरे-धीरे घुलती हो,
कानों में मिसरी-मिसरी |

मेरी बगिया के भँवरे भी,
गीत नया सा गाते हैं |
जैसे बजती हो वृन्दावन में,
किसना की बसुरी-बसुरी |

उजली, धुली, चमकती धूप,
छत पर है उतरी-उतरी |
खिड़की की सलांखों से,
मेरे घर में है बिखरी-बिखरी |

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 17/02/2021
    • Garima Mishra 28/02/2021

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